6 Best Gautam Buddha Moral Stories in Hindi

Gautam Buddha Moral Stories in Hindi – गौतम बुद्ध के बचपन का जीवन बहुत ही ऐश्वर्या में बीता। उनके पास में सारी चीजें मौजूद थे जिससे वह एक अच्छा जीवन बिता सकते थे। लेकिन वह सब पाकर भी उन सब चीजों से संतुष्ट नहीं थे। उनका मन हमेशा सत्य को जानने के लिए विचलित रहता था। वह सत्य जीवन का परम सत्य था जिसे जानने के लिए महात्मा बुद्ध ने अपना घर बार सब कुछ छोड़ दिया। इसके बाद उनके जीवन में ढेरों परिवर्तन आए और उनके जीवन के इन्हीं परिवर्तनों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं इसीलिए हम इस पोस्ट में महात्मा बुद्ध के जीवन के कुछ ऐसी कहानियों को लेकर आए हैं जिससे आपके जीवन में भी बदलाव जरूर आएंगे। तो चलिए पढ़ते हैं “Gautam Buddha Moral Stories in Hindi” –

क्रोध एक दुश्मन – Gautam Buddha Moral Stories in Hindi

एक समय की बात है भगवान गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए थे और उन्हें उपदेश दे रहे थे। तब उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, “क्रोध इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है। क्रोध करने वाला व्यक्ति खुद को हानि पहुंचाता ही है लेकिन दूसरों को भी हानि पहुंचाता है। वह प्रतिशोध की आग में जलता है और अपने जीवन को बर्बाद करता है।”

उनके उपदेश खत्म हो जाने के बाद उनके शिष्यों में से एक शिष्य खड़ा होता है और उसे बोलता है, “तू एक ढोंगी है! तेरी बातें मनुष्यों के रहन-सहन से विपरीत है। तू जो भी कहता है उसे अपने जीवन में अनुसरण नहीं करता और दूसरों को यह सब करने कहता है।”

जब उसका वह शिष्य गौतम बुद्ध को उल्टी-सीधी बातें कह रहा था तब गौतम बुद्ध ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और वे शांत बैठे थे। लेकिन ऐसे में वह व्यक्ति और भी ज्यादा गुस्सा हो गया और गुस्से में आकर उसने गौतम बुद्ध के मुंह पर थूक दिया। इसके बाद भी महात्मा गौतम बुद्ध को गुस्सा नहीं आया और वे शान्त थे। उन्होंने अपने चेहरे से थूक को पोछा और वह चुपचाप बैठ गए।

यह सब देखकर उस शिष्य को समझ नहीं आया कि वह क्या करेगा। गुस्से में आकर वह उस जगह को छोड़कर चला गया और अगले दिन अपने घर पहुंचा। जैसे ही वह अपने घर पहुंचा तब तक उसका दिमाग शांत हो चुका था। दिमाग के सांत होते ही उसे इस बात का एहसास हुआ कि उसने कितनी बड़ी गलती की है। उसे पाप हुआ है।  वह खुद को मन ही मन कहने लगा, “यह मैंने क्या कर दिया। मैंने महात्मा बुद्ध का अपमान किया है। ऐसा पाप मैं कैसे कर सकता हूं। मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। मुझे जाकर उनसे माफ़ी मांगनी होगी।”

यह कहकर वह तुरंत हि गौतम बुद्ध के पास चला गया लेकिन गौतम बुद्ध उस स्थान पर नहीं थे। ऐसे में वह शिष्य जगह-जगह भटककर उन्हें खोजने लगा। जैसे ही उसे महात्मा बुद्ध मिले तो वह उनके पैरों पर गिर गया और उनसे कहने लगा, “मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे गलती हुई है। मैंने आपका अपमान किया है। मैंने यह बहुत बड़ा पाप किया है।”

यह सब देखकर गौतम बुद्ध ने उससे कहा, “शांत हो जाओ, क्या बात है मुझे बताओ? तुम कौन हो?”

गौतम बुद्ध के यह पूछने पर वह शिष्य चौक गया। वह सोचने लगा की महात्मा बुद्ध मुझे कैसे भुल सकते है। मैने तो उनका अपमान किया था।

यह सोचकर उसने महात्मा बुद्ध से पूछा, “मैं वही शिष्य हूं जिससे कल आपका अपमान किया था और आप इतनी जल्दी मुझे भूल गए।”

“हमें कल की बातों को कल में हि छोड़ देना चाहिए। वह अच्छा हो या बुरा उसके बारे में बार-बार विचार नहीं करना चाहिए। मैं बीती हुई बातों को पीछे छोड़कर आगे चलता हूं और ऐसा ही हम सब को भी करना चाहिए।” महात्मा बुद्ध ने उस शिष्य से कहा।

महात्मा बुद्ध की यह बातें सुनकर वह शिष्य और भी ज्यादा प्रभावित हुआ और उनसे बोला मैं आज से आपकी हर बातों को माना करूंगा।

Moral of the story – इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि क्रोध करना इंसान के लिए सबसे खतरनाक है। यह मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है जो उसे बर्बाद कर सकता है। इसलिए मनुष्य को कभी भी क्रोध नहीं करना चाहिए।

इस कहानी से हमें यह भी सीख मिलती है कि बीती हुई बातों को हमें भूलकर आगे बढ़ना चाहिए। अगर कोई मनुष्य अपनी बीती हुई बातों पर ज्यादा ध्यान देता है तो उसका ध्यान पूरी तरह से भूतकाल में लगा होता है और वह इंसान कभी भी आगे बढ़ने की और विचार नहीं कर पाता। इसीलिए हमेशा पुरानी बातों को छोड़कर आगे बढ़ने की सोचे।

Also Read – 30 Short Moral Stories in Hindi

शान्त मन – Gautam Buddha Moral Stories in Hindi

एक समय की बात है गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक सफर पर थे। सफर में चलते-चलते बुद्ध को प्यास लगी तो उन्होंने अपने एक शिष्य से कहा कि जाओ जाकर मेरे लिए पीने का पानी लेकर आओ।


अब ऐसे में उस शिष्य ने आसपास देखा तो कहीं कोई पानी का स्रोत नहीं मिला। लेकिन उसने और कोशिश की तो रास्ते में उसे एक पानी का स्त्रोत मिला।

वहां उसने देखा कि कुछ लोग उस पानी के स्त्रोत में कपड़े धो रहे हैं और तभी वहाँ से एक बैलगाड़ी उस पानी के स्त्रोत के ऊपर से गुजर गया। ऐसे में वहां का पूरा पानी गंदा हो गया और उसमें मिट्टी भर गया। फिर उसने सोचा कि इस गंदे पानी को, मिट्टी से भरे हुए पानी को मैं बुद्ध के लिए कैसे लेकर जा सकता हूं?

तो वह खाली हाथ ही वापस चला गया और गौतम बुद्ध से जाकर यह बात बताई। बुद्ध ने कहा कि ठीक है हम सब यहां इस बड़े से पेड़ की छाया में बैठकर आराम करते हैं।

कुछ समय बीता फिर गौतम बुद्ध ने उसी शिष्य को फिर से पानी लाने को कहा। अब वह शिष्य वापस से उसी पानी के स्रोत के पास गया। वहां जाकर उसने देखा कि वह पानी बिलकुल साफ था और पीने योग्य था। अब वह शिष्य बुद्ध के लिए वह पानी लेकर गया और उसने वह पानी गौतम बुद्ध को पिलाया।

बुद्ध ने सब को यह बात बताई कि जिस तरह से पानी में कीचड़ मिट्टी फैल गई थी। लेकिन उसे थोड़ी समय तक छोड़ देने तक उसका सारा मिट्टी नीचे बैठ गया और वह पानी वापस से साफ हो गया। उसी तरह से हमारा मस्तिष्क भी है। जब हमारा मस्तिष्क अशांत हो तब उसे वक्त देकर उसे शांत करो। हमारा मस्तिष्क भी थोड़े समय के बाद शांत जरूर होगा। अशांत मस्तिष्क से कोई भी निर्णय नहीं लेना चाहिए। बस हमें करना यह है कि हमें अपने मस्तिष्क को थोड़ी देर तक शांत रखना है जिससे कि हम अच्छे फैसले ले सकते हैं। बच्चों की कहानियाँ ।

Moral of the story- अशांत मस्तिष्क से लिए हुए फैसले हमेशा गलत होते हैं। हमें हमेशा शांत मस्तिष्क के साथ ही कोई निर्णय लेना चाहिए जिससे कि गलतियां होने की गुंजाइश कम हो जाती है।

मारने वाले से बचाने वाला बड़ा – Gautam Buddha Moral Stories in Hindi

गौतम बुद्ध को हम बहुत अच्छे से जानते हैं जिन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना की और उन्होंने लोगों के जीवन में ढेरों बदलाव लेकर आए थे। यह कहानी भी उनके बचपन की है जब वे छोटे थे और उन्हें गौतम बुद्ध के नाम से नहीं बल्कि सिद्धार्थ के नाम से जाना जाता था। उनके एक चचेरे भाई भी थे जिनका नाम देवदत्त था। चलिए जानते हैं इस कहानी के बारे में –

राजा सिद्धार्थ के महल के पास एक उद्यान था जहां पर राजा सिद्धार्थ बैठकर प्रकृति का आनंद लिया करते थे। एक दिन जब वे अपने बगीचे में बैठे हुए थे कि तभी एक घायल हंस उनके पैर के पास आकर गिरा। उसके शरीर में एक तीर लगा हुआ था। उसे देखने से प्रतीत हो रहा था कि किसी शिकारी उसका शिकार किया है।

हंस को तकलीफ में देखकर और उसे यूं ही फड़फड़ाता देख कर राजा सिद्धार्थ का दिल पिघल गया और उन्होंने उस हंस की सहायता करनी चाही।

उन्होंने सबसे पहले उस हंस के शरीर से वह तीर निकाला और घायल जगह पर मलहम लगाकर उसकी पट्टी की। यह सब कर लेने के बाद देवदत्त कुछ खोजता हुआ सिद्धार्थ के पास आया।

देवदत्त जैसे ही सिद्धार्थ के पास पहुंचा उसने कहा, “अच्छा तो यह तुम्हारे पास है। लाओ इसे मुझे दे दो इसका शिकार मैंने किया है। इसका शिकार करने में मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ी थी। इसपर मेरा अधिकार है।”

देवदत्त की यह बात सुनकर सिद्धार्थ ने उससे कहा, “नहीं यह हंस घायल था और मेरे पास आया। मैंने इसकी मदद की और उसकी जान बचाई। इसीलिए इस पर अधिकार मेरा है।” दोनों भाइयों के बीच उस हंस के अधिकार को लेकर बहस होने लगी। अब वे जानना चाहते थे कि उस हंस पर किसका अधिकार ज्यादा है? ऐसे में उन दोनों ने निर्णय लिया कि वे दोनों राजा के पास जाएंगे। सिद्धार्थ की पिताजी कपिलवस्तु के राजा थे।

वे दोनों राजा के पास गए। राजा के पास पहुंचते ही देवदत्त ने सबसे पहले कहा, “महाराज इस हंस पर सबसे ज्यादा अधिकार मेरा है क्योंकि मैंने इसका शिकार किया है। इस वजह से आप सिद्धार्थ से कहिए कि वह यह हंस मुझे दे दे।”

जैसे ही देवदत्त की बात पूरी हुई तब राजा ने दोनों को शांत किया और फिर उनसे पूछा कि पूरी बात क्या है?

ऐसे में सिद्धार्थ ने राजा को पूरी बात बताई और उनसे बोला, “पिताजी बात यह है कि इस हंस का शिकार देवदत्त ने किया था लेकिन यह हंस घायल होकर मेरे कदमों के पास आ गिरा। इसे घायल देखकर मैंने इसका इलाज किया और इसे ठीक किया। अब आप ही बताइए कि इस हंस पर सबसे ज्यादा अधिकार मेरा है।”

राजा ने इस मामले पर अच्छे से विचार किया। विचार कर लेने के बाद उन्होंने सभा में सबसे एक बड़ी बात कही और वह बात यह थी कि “मारने वाले से ज्यादा बचाने वाला का अधिकार सबसे ज्यादा होता है। इसीलिए इस हंस पर सबसे बड़ा अधिकार सिर्फ और सिर्फ सिद्धार्थ का है क्योंकि उसने उस हंस को मारा नहीं बल्कि उसे घायल देखकर उसका इलाज किया और उसकी जान बचाई। राजा के ऐसा कह लेने के बाद देवदत्त को बात अच्छे से समझ आ गई। वह भी जान चुका था कि मारने वाले से ज्यादा बचाने वाले का अधिकार सबसे ज्यादा होता है।

Moral of the story- इस कहानी से हमें समझ में आता है कि मारने वाले से ज्यादा बचाने वाला बड़ा होता है और उसका अधिकार भी मारने वाले से ज्यादा होता है। इसीलिए हमें भी दूसरों की मदद करनी चाहिए और परेशान लोगों की सहायता करनी चाहिए। ऐसा करने से हम अपने आसपास के समाज को अच्छा और बेहतर बनाते हैं। एक अच्छा समाज ही एक अच्छे देश की पहचान होती है। इसीलिए आप भी आज से प्रण लीजिए कि आप भी दूसरों की सहायता जरूर करेंगे।

Character Analysis

अगर हम सिद्धार्थ के स्वभाव की बात करें तो वह बहुत ही शांत है और दूसरों की मदद करने में हमेशा आगे रहते हैं। उन्होंने हंस को तकलीफ में देखा तो उसकी मदद करने के लिए तुरंत उठ पड़े। इसे यह बात पता चलती है कि सिद्धार्थ को दूसरों को तकलीफ में देख कर खुद को भी तकलीफ होती है।

अगर हम देवदत्त की बात करें तो वह एक लड़ाकू बालक था जिसमें सब्र की कमी थी। देवदत्त बस इतना ही जानता था मरने वाले का अधिकार ज्यादा होता है। वह जीवो को मारने में संकोच नहीं करता था जोकि गलत है। वह सिद्धार्थ के विपरीत था।

बुद्ध और भिखारी – Gautam Buddha Moral Stories in Hindi

एक बार एक भिखारी अपने जीवन से परेशान हो चुका था क्योंकि उसे अपने जीवन को चलाने के लिए भीख मांगना पड़ता था। उसे हर एक चीज के लिए भीख मांगना पड़ता था। इसी बात को लेकर वह दुखी रहता और दिन भर यही सोचता कि उसकी जीवन में बदलाव कैसे आएगा? यह सोचकर वह निराश हो जाता।

वह हर दिन देखता की बहुत सारे लोग निराश होकर, आंखों में आंसू लिए लोग और विभिन्न चिंताओं से परेशान लोग गौतम बुद्ध की तरफ जाते और वापस लौटते समय वे लोग बहुत ही खुश होते थे। वह भिखारी यह नहीं समझ पा रहा था कि गौतम बुद्ध उनके साथ ऐसा क्या करते थे कि वे बेहद खुश हो जाते थे? वापस लौटते हुए लोगों के हाथों में ना तो ढेर सारे पैसे होते थे ना ही सोने चांदी तो फिर ऐसा क्या होता था कि लोग बुद्ध के पास से लौटते वक्त इतना खुश होते थे? यह सब सोचकर वह भिखारी भी निर्णय लिया कि वह भी महात्मा बुद्ध के पास जाएगा और देखेगा कि ऐसा वहां क्या हो रहा है की दुखी लोग उनके पास जाकर खुश हो जाते हैं।

वह बुद्ध से मिलने के लिए उनके पास चल पड़ा। जहां बुद्ध मौजूद थे वहां बहुत लंबी कतार लगी हुई थी तो वह भिखारी भी कतार में लग गया। कतार में लगकर वह अपनी बारी का इंतजार करने लगा। देखते ही देखते उसकी बारी आई और उसने बुद्ध से कहा, “बुद्ध मैं बहुत ही गरीब हूं। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मुझे अपना जीवन चलाने के लिए भी दूसरों से भीख मांगनी पड़ती है। अब आप ही बताइए कि मैं अपने जीवन को कैसे बेहतर कर सकूं?”

यह सब सुनकर बुद्ध ने कहा, “तुम गरीब नहीं हो। तुम्हें ऐसा लगता है क्योंकि आज तक कभी तुमने किसी के लिए कुछ भी नहीं किया। ना ही तुमने कभी किसी को दान दिया। ना ही तुमने दूसरों के लिए कुछ किया।”

यह सब सुनकर भिखारी के मन में एक आशंका जाग उठी। अपनी आशंका को दूर करने के लिए भिखारी ने पूछा, “मैं तो एक भिखारी हूं। मैं लोगों को दान कैसे दे सकता हूं और कैसे लोगों की सहायता कर सकता हूं? मुझे तो खुद अपना जीवन चलाने के लिए दूसरों से मांगना पड़ता है।”

यह सब सुनने के बाद गौतम बुध थोड़ी देर चुप रहे और फिर उसे बोले, “तुम्हारे पास हाथ है जिससे तुम लोगों की सेवा में लगा सकते हो और दूसरों का भला कर सकते हो। इसके अलावा तुम्हारे पास मुह है जिससे तुम लोगों से अच्छी-अच्छी बातें कर सकते हो और दूसरों का हौसला बढ़ा सकते हो। यह सब करके भी तुम दूसरों की सहायता कर सकते हो। जरूरी नहीं कि दान सिर्फ पैसों से किया जाए। हम चाहे तो हम शिक्षा का भी दान कर सकते है। चाहे तो अन्न का भी दान कर सकते हैं। ऊपर वाले ने अगर किसी को पूर्णतःअच्छा शरीर दिया है तो वह गरीब नहीं है। वह बस दिमाग से गरीब है। उसे इस विचार से हटकर दूसरों की सेवा में लगाना चाहिए।”

बुद्ध की यह सब बातें सुन लेने के बाद वह भिखारी बहुत ही ज्यादा खुश हो गया और उसका मन अब संतुष्ट था।

Moral of the story – हम सब इस बात की चिंता में समय बर्बाद करते हैं कि हम गरीब हैं लेकिन यह सत्य नहीं है। सत्य तो यह है कि जब तक हमारा शरीर पूरी तरह से बेहतर है तो हम उसका उपयोग करके आगे बढ़ सकते हैं और खुद के जीवन को बेहतर बना सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति सिर्फ अपने गरीबी पर ध्यान दें और उसे बदलने की कोशिश ना करें तो वह मूर्ख है।

इसके अलावा हमें इस कहानी से यह भी सीख मिलती है कि दान सिर्फ धन का ही नहीं शिक्षा, भोजन, अच्छे विचार, आदि का भी किया जाना जरूरी है। अगर आपके पास धन नहीं है तो आप शिक्षा का दान कर सकते हैं या फिर आप दूसरों के लिए अच्छे विचारों का भी दान कर सकते हैं। इससे समाज बेहतर होता है।

Gautam Buddha Moral Stories in Hindi
Gautam Buddha Moral Stories in Hindi

सबकुछ स्वीकार करना जरुरी नहीं – Gautam Buddha Moral Stories in Hindi

गौतम बुद्ध जगह-जगह घूमकर उपदेश दिया करते और अच्छे विचारों को बांटा करते। वे लोगों के जीवन के दुखों को दूर किया करते। उनकी बातों को सुनकर लोग बहुत खुश हो जाते। इसीलिए लोगों उन्हें बहुत पसंद किया करते थे। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग थे जो गौतम बुद्ध से ईर्ष्या करते थे।

एक बार गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ भ्रमण कर रहे थे कि तभी एक व्यक्ति उनके पास आया और उन्हें उल्टी-सीधी गालियां देने लगा और उन्हें ढोंगी बोला। यह सब सुन लेने के बाद भी महात्मा बुद्ध ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी वे शांति और चुपचाप रहे। ऐसे में उस व्यक्ति ने फिर से गौतम बुद्ध को उल्टी-सीधी गालियां दी और उनके पूर्वजों के बारे में भला बुरा कहने लगा लेकिन फिर भी महात्मा बुद्ध ने उसे कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और वे शांत रहें।

यह सब देखकर उनके शिष्य और आस-पास मौजूद लोग अचरज में थे कि महात्मा बुध उस व्यक्ति को कोई जवाब क्यों नहीं दे रहे?

कुछ देर बाद वह व्यक्ति अपने आप ही शांत हो गया। उसके  शान्त हो जाने के बाद बुद्ध ने कहा, “अगर कोई हमें तोहफा देता है तो यह हमारे ऊपर है कि उसे हम लेते हैं या नहीं। अगर हम उसे अपना लेते हैं तो वह हमारे पास आ जाता है। वहीं अगर हम उसे नहीं अपनाते तो वह उसी व्यक्ति के पास चला जाता है जिसने वह तोहफा दिया था। उसी प्रकार इस व्यक्ति द्वारा दिया गया अपशब्द स्वीकार करना या ना करना मेरे ऊपर है। हमें कभी भी तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए। हमें हमेशा शांत होकर सही या गलत के बारे में विचार करके प्रतिक्रिया देनी चाहिए। इससे बुरी से बुरी बातें टल जाती है और मुसीबतों से छुटकारा भी मिलता है।”

बुद्ध की यह सब बातें सुन लेने के बाद वह व्यक्ति शर्मिंदा हो गया और तुरंत बुद्ध के चरणों में गिर गया और उनसे माफी मांगने लगा। बुद्ध ने उसे माफ किया और भी आगे बढ़ चले।

Moral of the story – कुछ भी स्वीकार करना या ना करना हमारे ऊपर है इसीलिए हमें जीवन के लिए अच्छी चीजों को स्वीकार करना चाहिए और वही ऐसी चीजों को अस्वीकार करना चाहिए जो हमारे जीवन के लिए अच्छी नहीं है। इस कहानी से हमें यह भी सीख मिलती है कि जरूरी नहीं कि दूसरे द्वारा किया गया अपमान सच में आपका अपमान करता हो। आप अपमानित तब होते हैं जब आप अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। अगर आपका कोई अपमान करें तो उसे आप एक अच्छी प्रतिक्रिया दीजिए। ऐसा करने से आपका अपमान नहीं होगा लेकिन अगर आप बुरी प्रतिक्रिया देंगे तो इससे आपका अपमान होना तय है। इसीलिए सोच समझकर प्रतिक्रिया देनी चाहिए।

गौतम बुद्ध और अंगुलिमाल की कहानी – Gautam Buddha Moral Stories in Hindi

बहुत सालों पहले भारत में मगध नाम का एक राज्य था। वह राज्य बहुत ही संपन्न था। राज्य में एक सोनापुर नाम का गांव था जहां के लोग अपना सारा काम दिन में किया करते थे। लेकिन रात होते ही सारे लोग अपने घर के अंदर चले जाते और कोई भी रात के समय अपने घरों से बाहर नहीं निकलता था।

लोग ऐसा बस एक ही कारण से किया करते थे और वह था अंगुलिमाल। अंगुलिमाल बहुत ही खतरनाक डाकू था जो लोगों को लूटकर मार देता था। वह लोगों के बीच डर बनाए रखने के लिए मारे हुए व्यक्ति की उंगलियां काटकर उसका माला बनाकर पहनता था।

अंगुलिमाल मगध के एक गुफा में रहा करता था। वह जिस जंगल के गुफा में रहता था लोग वहां से भी गुजरने से डरते थे। क्योंकि सबको अंगुलिमाल से बहुत डर लगता था।

एक दिन गौतम बुद्ध सोनापुर से गुजर रहे थे कि तभी उन्होंने लोगों को चिंतित देखा। लोगों को इस तरह से परेशान देखकर गौतम बुद्ध ने उन सबसे पूछा, “क्या बात है आप सब इतने डरे हुए क्यों है?”

ऐसे में लोगों ने महात्मा बुद्ध के सवालों का जवाब दिया, “यहाँ एक डाकू अंगुलिमाल का बुरा प्रकोप है। वह लोगों को लूटकर मार देता है और उनकी उंगलियों को काटकर उसका माला बनाकर पहन लेता है। इसीलिए हमारे गांव के लोग बेहद डरे हुए हैं। अब आप ही बताइए कि हम क्या करें।”

“अच्छा ऐसी बात है। तो फिर वह अंगुलिमाल रहता कहां है?” महात्मा बुद्ध ने लोगों से पूछा।

ऐसे में एक व्यक्ति सामने आया और महात्मा बुद्ध को बोला, “वह जंगलों में रहता है। जंगलों के अंदर एक गुफा है जिसके अंदर अंगुलिमाल रहता है।”

यह सब सुन लेने के बाद महात्मा बुद्ध अंगुलिमाल से मिलने जंगल की ओर चल पड़े। सोनापुर गांव के लोगों ने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन फिर भी वह नहीं रुके और जंगल की ओर चल पड़े।

जैसे ही वह जंगल के पास जा पहुंचे तब अंगुलिमाल अपने गुफा में से निकलकर हाथ में तलवार लिए खड़ा हो गया। गौतम बुद्ध ने अंगुलिमाल को अनदेखा किया और आगे बढ़ चले। यह देखकर अंगुलिमाल बुद्ध का पीछा करने लगा। पीछा करते-करते अंगुलिमाल जोर से चिल्लाकर बोला, “ए सन्यासी रुक जा।”

“मैं तो रुक गया। तुम कब रखोगे? तुम अपनी यह हिंसा कब बंद करोगे?” महात्मा बुद्ध ने कहा।

ऐसे में अंगुलिमाल क्रोधित हो गया फिर उसने गौतम बुद्ध से कहा, “सन्यासी तु मुझे जानता नहीं है। मैं इस राज्य का सबसे शक्तिशाली मनुष्य हूँ।”

“मैं नहीं मानता कि तुम सबसे शक्तिशाली मनुष्य हो।” गौतम बुद्ध ने कहा।

यह सुनकर अंगुलिमाल बोला, “अच्छा अगर ऐसी बात है तो तुम ही बताओ की मैं ऐसा क्या कर जिससे तुम मनोगे?”

“तुम जाओ और उस पेड़ में से 10 पत्तियाँ तोड़कर लाओ।” महात्मा बुद्ध ने कहा।

महात्मा बुद्ध के कहने पर अंगुलिमाल ने वही किया। वह पेड़ के पास गया और उसमें से दस पत्तियाँ तोड़ लाया। फिर बुद्ध ने कहा, “जाओ अब इन पत्तियों को वापस से उस पेड़ मे जोड़ दो।”

यह सुनकर अंगुलिमाल अचंभित हो गया और उसने महत्मा बुद्ध से कहा, “ये कैसा बेहूदा मज़ाक है। भला कोई पत्तियों को तोड़कर वापस पेड़ से जोड़ सकता है क्या?”

ऐसे में बुद्ध ने कहा, “तुम खुद्को सबसे शक्तिशाली कहते हो और इन पत्तियों को जोड़ नही सकते। अगर तुम किसीको जोड़ नहीं सकते तो उसे तोड़ो मत। अगर तुम किसीको जीवन नहीं दे सकते तो उन्हें मारों मत।”

यह सुनकर अंगुलिमाल की आंखें खुल गई। वह बुद्ध के चरणों में गिर गया और उनसे माफ़ी माँगने लगा। इसके बाद से अंगुलिमाल बुरे काम करना छोड़ दिया और वह महात्मा बुद्ध का शिष्य बन गया।

मोरल ऑफ द स्टोरी – इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि इंसान चाहे कितना भी बुरा क्यों ना हो वह बदल सकता है।

तो यह थी “Gautam Buddha Moral Stories in Hindi”। अगर आपको यह कहानियां अच्छी लगी तो इसे अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें और उन्हें भी गौतम बुद्ध के विचारों से अवगत कराए और उनके जीवन में परिवर्तन लेकर आए।

Recent Posts

Leave a Comment