इमानदार व्यापारी की कहानी – Akbar Birbal Story in Hindi

एक इमानदार व्यापारी। एक राजा का ईमानदार होना बहुत जरूरी है। एक राजा को हमेशा दूसरों के साथ न्याय करना चाहिए। बादशाह अकबर हमेशा लोगो के साथ इंसाफ करते थे और उनके पास जो भी आता था उसके साथ न्याय होता था। यह कहानी भी इंसाफ के ऊपर ही है। तो चलिए जानते हैं एक ईमानदार व्यापारी की कहानी –

Read This Story in English – The Honest Trader – Akbar Birbal Story in English

एक इमानदार व्यापारी

एक दिन दो व्यापारी बादशाह अकबर के पास उनके दरबार में पहुंचे। उनमें से एक ने कहा, “बादशाह अकबर की जय हो। जहांपनाह मेरा नाम गोपालदास है और मैं एक मक्खन व्यापारी हूं। मैं बाजार में मक्खन बनाता हूं और उसे बेचता हूं। लगभग 1 महीने पहले मेरे पास चंदूराम आया था। उसने मुझसे सौ सोने की अशर्फियां मांगी थी लेकिन जब मैं उससे यह वापस उसे लेने गया। तो उसने कहा कि उसने कोई पैसे नहीं लिए है। यह कहकर वह मुझे सीधा मना कर दिया। मैं चाहता हूं कि आप मेरे साथ इंसाफ करें और चंदू राम से मेरे सोने वापस दिलवाए।”

Imandar Vyapari

तभी वहां खड़ा चंदूराम बोला, “जी नहीं हुजूर ऐसा कुछ भी नहीं है। गोपालदास मुझसे जलता है। वह मेरे व्यापार को खराब करना चाहता है। वह मेरे व्यापार की तरक्की देखकर जलता है। इस वजह से वह मेरा नाम खराब करके मेरे व्यापार को कमजोर करना चाहता है।”

बादशाह अकबर यह नहीं समझ पा रहे थे कि उन दोनों में से कौन सही और कौन गलत है। ऐसे में उन्होंने यह काम बीरबल को दिया। उन्होंने बीरबल से कहा कि वह इस बात का पता लगाएं कि इन दोनों मे से सच कौन बोल रहा है और झूठ कौन बोल रहा है?

इसके बाद बीरबल दे गोपाल दास को अपनी बात कहने को कहा और उससे पूछा, “क्या हुआ था उस दिन गोपालदास से सब कुछ विस्तार में बताओ।”

“लगभग 1 महीने पहले शाम के समय जब सब अपना दुकान बंद करके घर वापस जा चुके थे। तब मैं भी अपना सामान समेट कर दुकान को बंद करने की तैयारी कर रहा था। तभी मेरे पास चंदूराम आया। हम दोनों में अच्छी बात हुई। क्योंकि वह मेरा एक दोस्त है इसी के चलते हमने एक दूसरे से बातचीत की। बातचीत के दौरान ही चंदू रामदेव मुझसे ने मुझसे कहा कि उसे घी के लिए कुछ पैसे कम पड़ रहे हैं इसीलिए वह मुझसे सौ सोने की अशर्फियां माँगने लगा। मैंने उसे मदद के लिए वह सोने की अशर्फियां उसे तुरंत ही अपनी अलमारी से निकाल कर दी और इसके बाद वह वहां से चला गया। लेकिन कल जब मैं उससे वह सोने की अशर्फियां वापस मांगा तो वह मुझसे कहने लगा कि उसने कोई भी अशरफिया नहीं ली है और उसने मुझे अपने दुकान से भगा दिया। ” गोपालदास ने बीरबल को बताया।

“अच्छा तो यह बात है” बीरबल ने कहा। इसके बाद बीरबल ने चंदूराम को कहने का मौका दिया और उसे सारी बात बताने को कहा।

चंदूराम ने बताया, ” हुजूर, गोपालदास मेरे दुकान पर आता रहता है। क्योंकि हम दोनों एक अच्छे दोस्त हैं इसीलिए वह दुकान में आता रहता है। एक दिन उसने देखा कि मेरे दुकान में लोगों की गिनती बढ़ती ही जा रही है। उसने देखा कि मेरे व्यापार में वृद्धि हो रही है और यह देखकर उसे जलन होने लगी। उसने एक झूठी कहानी बनाई कि उसने मुझे 100 सोने की अशरफिया दी है और यह बात वह लोगों को बता बताकर मुझे बदनाम करने लगा ताकि मेरा व्यापार खराब हो जाए। हुजूर, मेरे इसकी एक भी अशरफिया मैने नहीं ली है।”

दोनों की बात सुनकर बीरबल ने बादशाह अकबर से कहा कि दोनों में से ही कोई एक झूठ बोल रहा है। बीरबल उसका पता लगाकर रहेगे कि कौन झूठा है और कौन सच बोल रहा है।

यह सब हो जाने के बाद उस दिन की सभा स्थगित हो गई और सब अपने घर लौट आए। बीरबल अपने घर वापस आकर एक जगह बैठकर सोचने लगा कि आखिर क्या किया जाए जिससे कि वह पता लगा सके। ऐसे में उन्होंने दोनों के बारे में जानने की कोशिश की। इसके लिए उन्होंने घर के एक नौकर रामू को बुलाया और उसे बाजार जाने को कहा। बीरबल ने रामू से कहा, ” रामू तुम बाज़ार जाओ और गोपालदास और चंदूराम के बारे में सारी जानकारी लेकर आओ।”

रामू बाजार की ओर गया और वहां लोगों से बातचीत किया। दोनों के बारे में जानकारी जुटाने के बाद वह घर वापस आया और बीरबल को सारी बात बताएं। रामू ने बीरबल को बताया, “मालिक दोनों में से गोपालदास सबसे ज्यादा ईमानदार है और लोग चंदूराम के साथ व्यापार करना पसंद नहीं करते क्योंकि वह कई बार लोगों के साथ बेईमानी करता है।”

यह सब सोचने के बाद बीरबल ने एक तरकीब सोची और उन्होंने दो मटका लाया। उन मटको में उन्होंने घी डाला। घी डालने के बाद उन्होंने एक मटके में एक सोने का सिक्का डाला और दूसरे के मटके में भी उन्होंने एक सोने का सिक्का डाला। इसके बाद उन्होंने रामू से कहा, “रामू तुम एक व्यापारी की तरह उन दोनों के पास जाओगे और यह घी बेचकर आओगे। उसके बाद तुम वही बाजार में ही रहना और देखना कि कौन आकर तुम्हें इन सोने के सिक्के को वापस लौटता है।”

रामू ने वैसा ही किया जैसा बीरबल ने उसे करने को कहा था। रामू बाजार गया और जाकर सबसे पहले उसने घी को गोपालदास को बेचा। फिर उसके बाद उसने जाकर घी चंदूराम को बेचा फिर वह बाजार में ही रहा।

अगले दिन बीरबल बादशाह अकबर के सामने सभा में पधारे। गोपालदास और चंदू राम भी वहां थे। बीरबल ने बादशाह अकबर को तुरंत बताया कि झूठ बोलने वाला व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि चंदराम है। यह सुनकर बादशाह अकबर ने बीरबल से पूछा, “अच्छा अगर ऐसी बात है तो बीरबल क्या तुम मुझे यह बता सकते हो कि तुम किस वजह से चंदूराम को झूठा कह रहे हो?”

बादशाह अकबर की इस सवाल का जवाब बीरबल ने दिया, “जहांपना, कल मैंने रामू को एक काम सौंपा था और मुझे पता चला कि गोपाल दास ने मटके में रखा हुआ सोने का सिक्का रामू को ईमानदारी के साथ वापस कर दिया। लेकिन दूसरी तरफ चंदूराम ने ऐसा नहीं किया। उसने वह सिक्का अपने पास ही रख लिया। इससे यह साबित होता है कि चंदू राम एक ईमानदार व्यक्ति नहीं है। जो व्यक्ति एक सोने के सिक्के को लेकर लालच दिखा सकता है तो सौ और सोने के सिक्कों के लिए बेईमानी तो कर ही सकता है। इसीलिए चंदूराम झूठ कह रहा है।”

यह सुनने के बाद बादशाह अकबर ने चंदूराम को सजा दी कि वह 100 सोने के सिक्के गोपालदास को वापस करें और उसके साथ-साथ और 100 सोने के सिक्के गोपालदास को दें क्योंकि उसने गोपालदास को परेशान किया था। यह सब हो जाने के बाद बादशाह अकबर ने फिर से बीरबल की तारीफ की और इस तरह से गोपालदास को न्याय मिला। एक इमानदार व्यापारी।

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