सोने के खेत की कहानी-Akbar Birbal Story in Hindi

Sone ka Khet. कभी-कभी बादशाह अकबर लोगों को, अपने काम करने वालों को, या सिपाही को छोटी सी गलती का बहुत ही बड़ा दंड दे दिया करते थे। ऐसा तभी होता है जब इंसान ज्यादा गुस्सा करने लगे। बादशाह अकबर की उम्र होने लगी थी। इसके चलते उन्हें गुस्सा भी बहुत ज्यादा आया करता था और गुस्से में आकर वे लोगों को बड़ी-बड़ी दंड दे दिया करते थे। यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है। तो चलिए जानते हैं सोने के खेत की कहानी –

Read This Story in English – Field of Gold-Akbar Birbal Story in English

सोने के खेत Sone ka Khet

बादशाह अकबर के कमरे में एक सुंदर सा फूलदान था। वह फूलदान बादशाह अकबर का बहुत ही खास था। वे उसका बहुत ही ज्यादा ध्यान रखते थे और उसकी साफ सफाई के लिए एक नौकर भी रखा गया था। एक दिन नौकर उस फूलदान की सफाई कर रहा था। तब वह अचानक हाथ से गिरकर टूट गया। ऐसे में वह नौकर बहुत ही ज्यादा डर गया था। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करेगा? क्योंकि वह जानता था कि वह फूलदान बादशाह अकबर का सबसे खास फूलदान था। ऐसे में वह डरकर टूटे हुए फूलदान को इकट्ठा किया और एक बस्ते में भरकर ले गया ताकि उसे कोई देख ना सके।

Sone ka khet

कुछ देर बाद बादशाह अकबर अपने कमरे में आए और उन्होंने वह फूलदान वह नहीं देखा। ऐसे में उन्होने अपने सिपाही को आवाज लगाएं, “सिपाही! सिपाही! तुरंत अंदर आओ।”

सिपाही जल्दी से अंदर आया और उसने बादशाह अकबर से पूछा, “जी हां जहांपना।”

“यहां एक फूलदान रखा हुआ करता था वह कहां है? क्या तुमने उसे किसीको ले जाते हुए देखा है?” बादशाह अकबर ने उस सिपाही से कहा।

“जी नहीं, जहाँपनाह मैंने तो किसी को उसे यहां से ले जाते नहीं देखा। लेकिन हां आपका नौकर उसकी सफाई कर रहा था।”

“जाओ तुरंत उस नौकर को लेकर आओ।” बादशाह अकबर ने उस सिपाही को आदेश दिया। वैसे में वह सिपाही तुरंत दौड़कर गया और उस नौकर को बुलाकर ले आया। नौकर को देखकर बादशाह अकबर ने उससे सवाल पूछा, “क्या तुम उस फूलदान की सफाई कर रहे थे?”

“जी हां हुजूर, मैं बस उसकी सफाई करने ले गया था।” उस नौकर ने बताया।

“तो फूलदान कहां है?”

बादशाह अकबर को गुस्सा देख वह नौकर बहुत ही ज्यादा डर गया था और उसे सब कुछ सच कह दिया, “मुझे माफ करना जहांपनाह वह गलती से टूट गया।”

यह सुनकर बादशाह अकबर और भी ज्यादा गुस्सा हो गए। ऐसे में उन्होंने कहा, “वह फूलदार गलती से किसी से भी गिर सकता था। इसके लिए मैं तुम्हें माफ भी कर देता। लेकिन तुमने मुझसे झूठ कहा है इसके लिए मैं तुम्हें माफ नहीं करूँगा। जाओ मैं तुम्हें देश निकाला की सजा देता हूं निकल जाओ इस सल्तनत से। फिर कभी भी यहां आने की कोशिश भी नहीं करना।” इसके बाद वह नौकर रोता हुआ वहां से चला गया।

अगले दिन बादशाह अकबर ने यह बात अपने लोगों को सभा में बताएं। बादशाह अकबर ने सबसे कहा कि झूठ बोला बहुत ही गलत बात है और झूठ बोलने वाले उन्हे बिल्कुल भी पसंद नहीं है। बादशाह की यह बात सुनकर सारे के सारे लोग उनके हा में हां मिलाने लगे। सब एक साथ कहने लगे, “जी हां बिल्कुल सही। आप सही कह रहे हैं। आपने बिल्कुल सही किया।”

लेकिन वही बीरबल चुपचाप बैठा हुआ था। बीरबल को देखकर बादशाह अकबर ने उसे पूछा, “क्या बात है बीरबल क्या तुम्हें नहीं लगता कि मैंने सही किया है? तुम बताओ क्या तुमने कभी झूठ बोला है?

“जी हां हुजूर मैंने कभी ना कभी तो झूठ बोला ही है। मैंने झूठ कभी किसी को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं कहा या किसी को दुख ना हो इस वजह से कहा होगा। हम सबने कभी ना कभी किसी वजह से झूठ कहा ही है।”

बीरबल की यह बात सुनकर बादशाह अकबर तुरंत गुस्सा हो गए और कहने लगे, “बीरबल तुमने झूठ कहा है। मेरे मंत्री होकर तूम झूठ कैसे कह सकते हो? मैं ये बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि मेरा मंत्री झूठा है।”

ऐसा कहकर बादशाह ने बीरबल को मंत्री के पद से हटा दिया और उसे सभा से निकल जाने को कहा। बीरबल एक अच्छे नागरिक की तरह बादशाह की बात सुनी और वह वहां से निकल गया। घर जाकर बीरबल सोचने लगा कि बादशाह अकबर छोटी-छोटी बात पर इतनी बड़ी-बड़ी सजा दे देते हैं। फिर बीरबल बादशाह अकबर को समझाने का तरकीब सोचने लगा। तभी उसने एक तरकीब सोची। उसके हाथ में गेहूं की एक बाली थी। तभी बीरबल ने अपने नौकर को बुलाया और उसे आदेश दिया, “रामू यहां आओ। तुम्हें बाजार जाना होगा। बाजार जाकर पता लगाओ कि सबसे अच्छा सुनार कौन है? जब तुम्हें वह मिल जाए तो उसे यह गेहूं की बाली दे देना और उसे कहना है कि हुबहू इसी की तरह सोने से बनी हुई गेहू की बाली बनाएं।”

बीरबल का नौकर वैसा ही किया जैसा बीरबल ने उससे कहा था। वह बाजार गया और एक सुनार के पास जाकर हुबहू वैसी ही गेहूं की बाली बनवा लाया और उसे बीरबल को दे दिया।

अगले दिन बीरबल उसे लेकर बीरबल बादशाह अकबर के पास पहुंचा। बीरबल को देखकर बादशाह ने उससे कहा, “बीरबल तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहां अपनी शक्ल दिखाने की? मैंने तुम्हें मना किया था यहां आने के लिए।”

बीरबल ने कहा, “मुझे माफ करना जहाँपनाह लेकिन मैं इस देश का नागरिक भी हूँ। मैं इस देश का भला चाहता हूं। मेरे पास कुछ ऐसी चीज है जिससे कि हमारा देश दुनिया का सबसे अमीर देश बन जाएगा।”

यह बात सुनकर बादशाह में उससे पूछा, “अच्छा ऐसी बात है तो मुझे खुल कर बताओ कि वह क्या है?”

सबसे पहले बीरबल ने बादशाह अकबर को वह सोने की बाली दिखाएं और उनसे कहा, “आप यह जो सोने की बाली देख रहे हैं। यह मुझे एक बहुत ही बड़े साधू ने दिया है। उन्होंने मुझसे कहा है कि इसे जाकर देश की सबसे उपजाऊ जमीन पर लगा दो और यह सोने की गेहू देगा।”

यह सुनकर सभा में मौजूद सारे लोग दंग रह गए और बादशाह अकबर भी सोचने लगे कि ऐसा हो सकता है भी या नहीं? उन्होने अपनी शंका को दूर करने के लिए, बादशाह ने बीरबल से पूछा, “हम कैसे मान लें कि वह साधु सच कह रहा था?”

बीरबल ने तुरंत जवाब दिया, “सबसे पहले तो मैं भी यही सोच रहा था लेकिन मैंने उस साधु को पानी में चलकर नदी पार करते हुए देखा। तब मैं समझ गया कि वह साधु झूठ नहीं कह रहे थे। वह बहुत ही बड़े साधु थे।” बीरबल की यह बात सुनकर बादशाह अकबर चौक गए और उसकी बात मान गए।

“अगर ऐसी बात है तो कल हम तुरंत जाकर सबसे अच्छी उपजाऊ जमीन खोजेंगे और इस सोने की गेहू को वहाँ बो देंगे।”

“आपको यह करने की कोई जरूरत नहीं है जहाँपनाह। मैंने वह ज़मीन खोज ली है।”

इसके बाद फिर बीरबल ने सबको उस जगह का पता बताया और उनसे कहा कि कल सब वहां आए। बादशाह ने आदेश दिया कि सारे के सारे लोग वहाँ कल उपस्थित रहेंगे।

अगले दिन सब वहां उपस्थित हुए। बीरबल ने सबको वह जमीन दिखाया। जमीन को अच्छे से देख लेने के बाद बादशाह अकबर ने बीरबल से कहा, “बीरबल यह लो यह बीज और इसे यहां लगा दो।”

“मुझे माफ करना जहाँपनाह मैं आपको एक बात बताना भूल ही गया कि यह इस बीज को वो हि लगा सकता है जिसने आज तक कभी कोई झूठ नहीं कहा। और आप यह तो जानते हैं कि मैंने झूठ कहा है। मैं यह बीज नहीं लगा सकता।” बीरबल ने बादशाह अकबर से कहा।

यह बात सुनकर बादशाह अकबर ने अन्य लोगों से कहा, “अच्छा ठीक है तुम में से कोई एक सामने आओ जिसने आज तक कोई भी झूठ नहीं कहा। वह आकर इस बीज को यहां लगाएगा।”

बादशाह अकबर के ऐसा कहने के बाद कोई भी सामने नहीं आया। यह देखकर बादशाह अकबर दंग रह गए और वे यह समझ गए की उनमें से सब ने झूठ कहा है और वे सब झूठे हैं।

यह सब देख बीरबल ने बादशाह अकबर से कहा, “जहांपना मुझे लगता है कि यहाँ सब ने झूठ कहा है। इसीलिए कोई भी आगे नहीं आ रहा। तो फिर एक काम करते हैं यह बीज आप ही जमीन पर लगा दीजिए।”

“अरे!यह बीज में नहीं लगा सकता।” बादशाह अकबर ने कहा।

“ऐसा क्यों जहाँपनाह?”

“मैंने भी बचपन में कभी ना कभी तो झूठ कहा ही था। इसीलिए मैं भी यह बीज नहीं लगा सकता।” बादशाह अकबर ने कहा।

“जी हां जहांपना, मैं भी उस दिन आपको यही कहना चाह रहा था कि हम सब ने कभी ना कभी झूठ कहा ही है। भले ही किसी को नुकसान पहचाने के लिए नहीं और ना ही किसी को ठेस पहुंचाने के लिए। हम कभी-कभी किसी की भलाई के लिए भी झूठ कहते हैं और ऐसा करना गलत नहीं है। अगर हम किसी को नुकसान पहुंचाने के लिए या किसी का बुरा करने के लिए झूठ कहते हैं तो वह गलत है।” यह कहकर बीरबल ने बादशाह अकबर को समझाया।

बीरबल की यह बात सुनकर बादशाह अकबर की आंख खुल गई और उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया। इसके बाद बादशाह अकबर ने बीरबल को उसका पद वापस कर दिया और अपने नौकर को भी वापस बुलवा लिया। Sone ka Khet.

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